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Tuesday, November 27, 2018

आखिर क्यों कांग्रेस और बीजेपी बस तीन सीटों वाले झाबुआ के पीछे पड़ी है

अगर मंदसौर मध्‍य प्रदेश की कृषि राजधानी है तो झाबुआ उसकी आदिवासी राजधानी है. पिछले कुछ सप्‍ताह में चुनाव के दौरान बड़े नेताओं ने यहां रैलियां की हैं

नेताओं की इस इलाके में दिलचस्‍पी उस समय समझ नहीं आती जब पता चलता है कि इस इलाके में केवल तीन ही विधानसभा सीटें झाबुआ, थांदला और पेटलावद हैं. लेकिन यह कारण तब समझ में आता है जब पार्टियों की आदिवासी वोटों को पाने की उत्‍सुकता सामने आती है.
मध्‍य प्रदेश में आदिवासियों की सबसे ज्‍यादा आबादी है. राज्‍य में अनुसूचित जनजाति की 21 प्रतिशत आबादी है. मध्‍य प्रदेश में 230 में से 47 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं. जाति के आधार पर देखा जाए तो प्रदेश में एसटी सबसे बड़ा समुदाय बनता है. राज्‍य में आदिवासी आबादी का सबसे बड़ा हिस्‍सा यानी 49 प्रतिशत जनजातीय लोग पश्चिमी सीमा पर धार, रतलाम, खरगोन, खंडवा, झाबुआ, बड़वानी और अलीराजपुर जिलों में रहते हैं.
आप झाबुआ को आदिवासी राजधानी कह सकते हैं. मध्‍य प्रदेश के हिसाब से यह ज्यादा है तो कम से कम मालवा इलाके पर तो यह बात लागू होती है. इसलिए आदिवासी मतों को ध्‍यान में रखते हुए जब भी रैली होती है तो वह यहीं होती है. यदि आप रैली वाली जगह को थोड़ा सा उत्‍तर दिशा की तरफ ले जाएंगे तो धार या बड़वानी जनजातीय लोग नहीं आएंगे. यदि आप दक्षिण की तरफ चले जाएंगे तो रतलाम और उज्‍जैन के हिस्‍सों के लोग छूट जाएंगे.
वे आगे बताते हैं कि 1980 के दशक में झाबुआ में ही अलग भीलीस्‍तान की मांग को लेकर आंदोलन हुआ थ. मध्‍य प्रदेश के रतलाम और राजस्‍थान के झालावाड़ को मिलाकर अलग राज्‍य बनाने की मांग की गई थी.
21 नवंबर को ज्योतिरादित्य सिंधिया ने झाबुआ में एक सार्वजनिक सभा की जिसकी शुरुआत उन्होंने इंदिरा माई' को याद करते हुए की. उनसे पहले स्थानीय कांग्रेस नेता विक्रांत भूरिया ने भी 7000 लोगों की सभा में अपने भाषण की शुरुआत 'ये इंदिरा माई की पार्टी है' से की थी. कांग्रेस के इस चार घंटे के कार्यक्रम में जिस बात ने सबसे अधिक ध्यान खींचा वह यह कि जनता ने उस वक्त सबसे अधिक खुशी प्रकट की जब वक्ताओं ने 'पूर्ण ऋण माफी' के अपने वायदे को दोहराया. कर्नाटक से होने का दावा करने वाले एक वक्ता को यह प्रमाणित करने के लिए मंच पर रखा गया था कि कांग्रेस ने कर्नाटक में अपना यहीं वायदा पूरा किया है.
आजादी के बाद से झाबुआ में लगातार कांग्रेस की जीत हुई. 2003 में जब विधानसभा चुनावों के परिणाम आए और झाबुआ में बीजेपी जीत गई तब तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ठट्ठा मारते हुए कहा था 'अब हम चुनाव हार गए हैं.
बीजेपी ने जहां इस क्षेत्र में अपनी जनजातीय पहुंच बढ़ाने की कोशिश की है, वहीं स्थानीय कार्यकर्ताओं का कहना है कि कांग्रेस के वोटर्स को अपनी तरफ खींचने की पर्याप्त कोशिशें नहीं की जा रही हैं. एक कार्यकर्ता ने कहा मैं यहां सुबह से कालसिंह भाबर को अपने गांव चलने के लिए मनाने के लिए बैठा हूं. वो केवल शहरी क्षेत्रों के दौरे पर जा रहे हैं और अभी तक उन्होंने गांवों का दौरा नहीं किया.
एक दूसरे कार्यकर्ता ने कहा कि उन्हें और उनके दूसरे साथियों को क्षेत्र में कुछ दिन पहले हुई पीएम मोदी की मेगा रैली के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. बीजेपी के विभिन्न गुटों के बीच की लड़ाई कार्यकर्ताओं के मनोबल में गिरावट की एक और बड़ी वजह है.
आरएसएस के एक पूर्व सदस्य जो कुछ समय पहले तक 'मंडल अध्यक्ष' थे, उनका दावा है कि उनके अपने काडर भी कांग्रेस के उम्मीदवार को हराने के लिए तैयार नहीं हैं. वो खुशी-खुशी कहते हैं, "लगातार जीत के बाद यहां के पूरे काडर को दूसरी जगहों पर भेज दिया गया. यहां आने वाले नए लोगों को क्षेत्र के बारे में कोई जानकारी नहीं थी और न ही स्थानीय लोगों के बारे में कोई जानकारी थी. यहां तक कि वे उनकी स्थानीय भाषा भी नहीं बोल सकते हैं. क्या आप कल्पना करेंगे कि झाबुआ में एक भी शाखा नहीं आयोजित होती है.
आरएसएस ने 2003 से पहले जिस 'एंटी कनवर्जन' कैंपेने की शुरुआत की थी, जिसका बड़ा चुनावी लाभ मिला, वह अब आदिवासी क्षेत्रों में नजर नहीं आ रहा है. अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि कई जनजातियों ने सालों से आरएसएस अथवा बीजेपी कार्यकर्ताओं को नहीं देखा है.

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