कर्नाटक में लोकसभा की तीन और विधानसभा की दो सीटों पर नवंबर की शुरुआत में हुए उपचुनावों में मिली हार ने बीजेपी के लिए नए सवाल खड़े कर दिए.
उपचुनाव के बाद प्रदेश बीजेपी के प्रमुख बीएस येदियुरप्पा पर उंगलियां उठनी शुरू हो गईं. उनके बेटे बीएस राघवेंद्र ने भले ही अपने पिता की छोड़ी शिमोगा लोकसभा सीट पर जीत हासिल की, लेकिन महज 55 हजार वोटों के अंतर से मिली इस जीत में बीजेपी के लिए खुश होने लायक कोई खास बात नहीं थी.
येदियुरप्पा फैक्टर
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी में दोबारा शामिल हुए 75 वर्षीय येदियुरप्पा पर नए नेताओं के लिए जगह बनाने का भारी दबाव है. पार्टी का एक तबका उन पर उपचुनावों में हार के अलावा कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार को गिराने में नाकामी का ठीकरा भी उन पर फोड़ रहे हैं. कर्नाटक में ऑपरेशन कमल दोहराने की उनकी अफसल कोशिश को सत्ता में वापसी की बेसर्बी का नाम दिया जा रहा है. कर्नाटक में बीजेपी को खड़ा करने वाले येदियुरप्पा को अब राज्य की सियासी जंग में लंगड़े घोड़े की तरह देखा जा रहा है. हालांकि राज्य में बीजेपी के लिए एक मुसीबत यह भी है कि यहां उसके पास युवा नेताओं की भी संख्या कोई खास नहीं हैं.
कर्नाटक की सियासत को करीब से देखें तो हालिया उपचुनावों में मिली हार येदियुरप्पा से ज्यादा बी. श्रीरामुलू के लिए बुरी खबर की तरह रही. 47 साल के श्रीरामुलू को संभावित उपमुख्यमंत्री और एक दिन राज्य की कमान संभालने वाले नेता के रूप में देखा जा रहा था.
लोकसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले हुए इस उपचुनाव ने राज्य में बीजेपी की एक तरह से कलई खोल दी है. यहां न तो येदियुरप्पा जैसे पार्टी के मौजूदा नेता और न ही श्रीरामुलू जैसे भविष्य के नेता के सितारे बुलंद दिख रहे हैं. वहीं सदानंद गौड़ा और जगदीश सेट्टार में न तो वह करिश्मा है और न ही पार्टी का नेतृत्व करने की क्षमता ही दिखती है. अनंत कुमार अब रहे नहीं और केएस ईश्वरप्पा बस अपने गृह प्रदेश शिमोगा में ही सिमट कर रह गए हैं.
बीजेपी के लिए खतरे की घंटी
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन बीजेपी के लिए संकट का संकेत है. पिछले दो बार के लोकसभा चुनाव में कुल मिलाकर 50% वोट हासिल करने वाली कांग्रेस-जेडीएस को यहां हरा पाना नामुमिक जान पड़ता है और हालिया उपचुनाव ने तो मानो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. ऐसे में पार्टी को एक बार फिर नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना पड़ेगा.
बीजेपी के अगर सारी चीज़े सही भी हो जाती हैं तो राज्य का सियासी समिकरण कुछ ऐसा बन रहा है कि उसके लिए 2014 का प्रदर्शन दोहराना नामुमकिन ही जान पड़ता है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां की 28 में से 17 सीटों पर कब्जा जमाया था. ऐसे में अमित शाह की कोशिश सत्ताधारी गठबंधन को तोड़कर जेडीएस को अपने साथ मिलाने की ही होगी. बीजेपी को इसके एवज में मुख्यमंत्री पद की कीमत चुकानी पड़ सकती है. अगर 80 सीटें जीतने वाली कांग्रेस एचडी कुमारास्वामी को सीएम पद सौंप सकती है, तो फिर 104 सीटों वाली बीजेपी क्यों नहीं.
येदियुरप्पा फैक्टर
2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी में दोबारा शामिल हुए 75 वर्षीय येदियुरप्पा पर नए नेताओं के लिए जगह बनाने का भारी दबाव है. पार्टी का एक तबका उन पर उपचुनावों में हार के अलावा कांग्रेस-जेडीएस गठबंधन सरकार को गिराने में नाकामी का ठीकरा भी उन पर फोड़ रहे हैं. कर्नाटक में ऑपरेशन कमल दोहराने की उनकी अफसल कोशिश को सत्ता में वापसी की बेसर्बी का नाम दिया जा रहा है. कर्नाटक में बीजेपी को खड़ा करने वाले येदियुरप्पा को अब राज्य की सियासी जंग में लंगड़े घोड़े की तरह देखा जा रहा है. हालांकि राज्य में बीजेपी के लिए एक मुसीबत यह भी है कि यहां उसके पास युवा नेताओं की भी संख्या कोई खास नहीं हैं.
कर्नाटक की सियासत को करीब से देखें तो हालिया उपचुनावों में मिली हार येदियुरप्पा से ज्यादा बी. श्रीरामुलू के लिए बुरी खबर की तरह रही. 47 साल के श्रीरामुलू को संभावित उपमुख्यमंत्री और एक दिन राज्य की कमान संभालने वाले नेता के रूप में देखा जा रहा था.
लोकसभा चुनाव से कुछ ही महीने पहले हुए इस उपचुनाव ने राज्य में बीजेपी की एक तरह से कलई खोल दी है. यहां न तो येदियुरप्पा जैसे पार्टी के मौजूदा नेता और न ही श्रीरामुलू जैसे भविष्य के नेता के सितारे बुलंद दिख रहे हैं. वहीं सदानंद गौड़ा और जगदीश सेट्टार में न तो वह करिश्मा है और न ही पार्टी का नेतृत्व करने की क्षमता ही दिखती है. अनंत कुमार अब रहे नहीं और केएस ईश्वरप्पा बस अपने गृह प्रदेश शिमोगा में ही सिमट कर रह गए हैं.
बीजेपी के लिए खतरे की घंटी
अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और जेडीएस के गठबंधन बीजेपी के लिए संकट का संकेत है. पिछले दो बार के लोकसभा चुनाव में कुल मिलाकर 50% वोट हासिल करने वाली कांग्रेस-जेडीएस को यहां हरा पाना नामुमिक जान पड़ता है और हालिया उपचुनाव ने तो मानो बीजेपी के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. ऐसे में पार्टी को एक बार फिर नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ना पड़ेगा.
बीजेपी के अगर सारी चीज़े सही भी हो जाती हैं तो राज्य का सियासी समिकरण कुछ ऐसा बन रहा है कि उसके लिए 2014 का प्रदर्शन दोहराना नामुमकिन ही जान पड़ता है. पिछले लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने यहां की 28 में से 17 सीटों पर कब्जा जमाया था. ऐसे में अमित शाह की कोशिश सत्ताधारी गठबंधन को तोड़कर जेडीएस को अपने साथ मिलाने की ही होगी. बीजेपी को इसके एवज में मुख्यमंत्री पद की कीमत चुकानी पड़ सकती है. अगर 80 सीटें जीतने वाली कांग्रेस एचडी कुमारास्वामी को सीएम पद सौंप सकती है, तो फिर 104 सीटों वाली बीजेपी क्यों नहीं.

No comments:
Post a Comment