स्वप्ना बर्मन ने हेप्टा थलन प्रतियोगिता में सर्वाधिक अंक हासिल किए हैं। तमाम परेशानियों के बावजूद भारत की बेटी ने देश का सिर गर्व से ऊंचा किया।
एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारत की पहली हेप्टाथलॉन स्वप्ना बर्मन दर्द और दरिद्रता के बीच रहते हुए सफलता की इबारत लिखने में कामयाब हुईं. गरीबी और शारीरिक विकृति ने इस चैम्पियन खिलाड़ी की राह में जीवन के हर मोड़ पर मुस्किले रही, लेकिन अपने साहस और समर्पण के दम पर स्वप्ना ने हर एक बाधा को दूर करते हुए इतिहास रचा.
स्वप्ना ने हालांकि एशियाई खेलों में इतिहास रचने के बाद यह स्वीकार किया था कि उनकी प्राथमिकता सरकारी नौकरी हासिल करना था क्योंकि इससे न सिर्फ उनका बल्कि उनके परिवार की माली हालत सुधर सकती थी. इसकी पीछे कारण यह था कि स्वप्ना ने अपनी अब की जिंदगी गरीबी में बिताई है लेकिन इसके बावजूद उन्होंने इसे अपनी सफलता की राह में बाधा नहीं बनने दिया.
स्वप्ना ने बताया, 'आजीविका चलाने के लिए मेरे अन्य तीन भाई-बहन संघर्ष करते थे. मैं सबसे छोटी हूं इसलिए मेरे पिता ने सोचा कि मैं खेलों से अगर कुछ कमा लूं परिवार को मदद मिलेगी.'
अगस्त में हुए एशियाई खेलों में दो दिन के कार्यक्रम में सात दौर के कड़े मुकाबले में कुल 6,026 अंक हासिल कर अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाली स्वप्ना ने न सिर्फ वित्तीय बाधाओं को पार किया बल्कि अपने दोनों पैरों की छह-छह अंगुलियों की परेशानियों को भी मात दी.

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