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Saturday, November 24, 2018

पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश को लेकर की चिंता व्यक्त कहा बुरे दौर से गुजर रहा है देश

अयोध्या में विवादित स्थल राम मंदिर निर्माण को लेकर तेज़ होती आवाज के बीच पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने देश के हालात को लेकर चिंता जाहिर की है. उन्होंने कहा कि देश में इस वक्त बुरे दौर से गुजर रहा है.
प्रणब मुखर्जी दिल्ली में Towards Peace, Harmony and Happiness Transition to transformation' विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन के उद्घाटन अवसर पर बोल रहे थे. पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, 'जिस धरती ने दुनिया को वसुधैव कुटुंबकम और सहिष्णुता, स्वीकार्यता और क्षमा के सभ्यतागत मूल्यों की अवधारणा दी, वह अब बढ़ती असहिष्णुता, गुस्से का इजहार और मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर खबरों में है.' उन्होंने कहा, कि शांति और सौहार्द्र तब होता है जब कोई देश बहुलतावाद का सम्मान करता है, सहिष्णुता को अपनाता है और विभिन्न समुदायों के बीच सद्भावना को बढ़ावा देता है.
प्रणब मुखर्जी फाउंडेशन और सेंटर फॉर रिसर्च इन रूरल डेवलपमेंट द्वारा आयोजित कार्यक्रम में पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, 'हमारे संविधान ने विभिन्न संस्थानों और राज्य के बीच शक्ति का एक उचित संतुलन प्रदान किया है. यह संतुलन बनाए रखा जाना चाहिए.' उन्होंने कहा कि पिछले 70 वर्षों में देश ने एक सफल संसदीय लोकतंत्र, एक स्वतंत्र न्यायपालिका और निर्वाचन आयोग, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, केंद्रीय सतर्कता आयोग तथा केंद्रीय सूचना आयोग जैसे मजबूत संस्थान स्थापित किए हैं, जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे को जीवंत रखते हैं और उन्हें संबल देते हैं.
मुखर्जी ने कहा कि देश को एक ऐसी संसद की जरूरत है जो बहस करे, चर्चा करे और फैसले करे, न कि व्यवधान डाले. एक ऐसी न्यायपालिका की जरूरत है जो बिना देरी के न्याय प्रदान करे. एक ऐसे नेतृत्व की जरूरत है जो राष्ट्र के प्रति समर्पित हो और उन मूल्यों की जरूरत है जो हमें एक महान सभ्यता बनाएं. उन्होंने कहा कि हमें एक ऐसी सरकार की आवश्यकता है जो लोगों में विश्वास भरे और जो हमारे समक्ष उत्पन्न चुनौतियों से निपटने की क्षमता रखता हो.
पूर्व राष्ट्रपति ने कहा, 'हालिया दिनों में ये संस्थान गंभीर दबाव में रहे हैं और उनकी विश्वसनीयता पर सवाल उठ रहे हैं. शासन और संस्थानों की कार्यप्रणाली को लेकर व्यापक तौर पर उदासीपन तथा मोहभंग की स्थिति है. इस विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए सुधार संस्थानों के भीतर से होने चाहिए.' उन्होंने कहा, 'संस्थान राष्ट्रीय चरित्र का आईना हैं. हमारे लोकतंत्र को बचाने के लिए इन संस्थानों को बिना किसी विलंब के लोगों का भरोसा वापस जीतना चाहिए.

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